"मातृ-भूमि की यादें - संजय जैन "बीना" "
विधा : कविता
मातृ-भूमि पर आज आकर
खुदको धन्य आज किया है।
बचपन की यादों को हमने
फिर आज महसूस किया है।।
गली-मोहल्ले देख पड़ोसियों को
दिल फिर से प्रफुल्लित हुआ है।
दादा-दादी काका-काकी आदि से
बात करके बहुत आनंदित हुआ है।।
बहुत लगाव था मुझसे
सामने वाले बाई बाबूजी का।
सबको मोहल्ले में ये डाटा थे
पर मुझको स्नेह-प्यार अपार दिया।।
घर में सबसे छोटा था मैं
और बहुत मासूस भी था।
इसलिए मुझको लेकर फिर
आपस में लड़ाईयां होती थी।।
सब कुछ याद आ रहा मुझको
आज फिर से बीना आने पर।
अपने बच्चों को दिखा रहा हूँ
आज अपनी मातृ-भूमि को।।
मेरी बेटी भी बहुत खुश है
आज बीना जो आकर के।
पापा मम्मी के बारे में सुनकर
हंस-हंस कर लोट-पोट हो रही।।
छोटी छोटी बातों पर फिर
अपनी टिप्पड़ियाँ दे रही।
कितना प्यार और अच्छा था
पापा आपका वो बचपन।।
हमें कहाँ ये सब मिला है
जो आप लोगों ने जिया है।
तीन साल की उम्र में ही
हमने बस्ता जो टँगा है।।
क्या होता है बचपन और
क्या होता है उसका महत्व।
हमको तो ये सब कुछ पापा
सच में आज समझ में आया है।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई

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