गाँधी - भारती सरदाना
सत्य अहिंसा की लाठी लिए हाथों में
वह निकल पड़ा देश को आजादी दिलाने।
शांति का वह दूत प्रेम का था वह समर्थक,
नफरत को मिटाकर दिलों में प्यार जगाने।
एक हाथ में चरखा था एक हाथ में लाठी,
नारा था स्वदेशी का थी जान यह माटी।
भाईचारा एकता की चाह ले मन में,
भर दिया स्वावलंबन हर एक जन में।
जात-पात धर्म की दीवार गिराने,
वह निकल पड़ा देश को आजादी दिलाने।
असहयोग आंदोलन आमरण अनशन,
आजादी दिलाने को किया कितने जतन।
अंग्रेजों भारत छोड़ो वह हक से कह गया,
त्याग कर आराम कितने ज़ुल्म सह गया।
दांडी यात्रा कर आत्मनिर्भर बनाने,
वह निकल पड़ा देश को आजादी दिलाने।
राष्ट्रपिता की पदवी बापू ने पाई,
बदले में इस देश को नई राह दिखाई।
मां-बाप के संस्कार शिरोधार्य करके,
बिन शस्त्र उठाए ही आजादी दिलाई।
प्रेम और स्नेह से भारत को सजाने,
वह निकल पड़ा देश को आजादी दिलाने।
नाम - भारती सरदाना /Bharti Sardana
पता - गुरुग्राम, हरियाणा / Gurugram, Haryana

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