सरकार - ख़ुशी झा
कुर्सी बदली, चेहरे बदले,
बदले कितने नारे हैं,
फिर भी जनता पूछ रही है—
कब दिन होंगे हमारे हैं?
वादों की बारिश खूब हुई,
पर प्यास अभी भी बाकी है,
किसी के घर में चूल्हा बुझता,
किसी की जेब में खनक नहीं है।
कहीं युवा रोज़गार को तरसे,
कहीं किसान कर्ज़ में डूबा है,
कहीं किताबें हाथ में लेकर
बच्चा मंज़िल को ढूँढता है।
सड़कें, पुल और भवन बने हैं,
देश विकास की ओर चले,
पर विकास की इस दौड़ में
क्या सबके हिस्से फूल खिले?
सरकारें आती-जाती रहेंगी,
जनता यहीं रह जाएगी,
जिस दिन सत्ता जन की सुन ले,
सच्ची खुशहाली आएगी।
सवाल हमारा बैर नहीं है,
सवाल लोकतंत्र की आवाज़ है,
जनता जब अपने हक़ पूछे,
तभी तो शासन का अंदाज़ है।
न हम केवल दोष लगाएँ,
न आँखें मूँदकर साथ चलें,
जो अच्छा हो, उसका मान करें,
जो गलत हो, उस पर बात करें।
कुर्सी चाहे जिसकी हो लेकिन,
जनता सबसे ऊपर हो,
सरकार वही सार्थक कहलाए,
जिसमें जनहित सबसे ऊपर हो।
ख़ुशी झा
महाराष्ट्र

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