Sunday, 18 October 2026

लोकतन्त्र - यशपाल निर्मल


लोकतन्त्र - यशपाल निर्मल

एक वृक्ष था गाँव के बीचोंबीच,

जिसकी जड़ें बहुत गहरी थीं,

शाखों पर बैठे थे अनेक पखेरू,

सबकी अपनी उड़ानें थीं।

कोई पूरब से सूरज चुनता,

कोई पश्चिम की बात करता,

कोई नीड़ बनाता पत्तों में,

कोई खुला आकाश पढ़ता।

वृक्ष ने कभी नहीं पूछा—

किसका रंग, किसकी बोली,

किसके पंखों में कितनी ताकत,

किसकी चोंच कितनी भोली।

सबको अपनी बात कहने का

एक खुला आकाश मिला था,

हर छोटे-बड़े पखेरू को

अपना एक विश्वास मिला था।

फिर एक दिन कुछ बाज़ आए,

अपने पंजों पर ताज सजाकर,

बोले—अब से यही दिशा होगी,

हम ही उड़ेंगे राह बनाकर।

उन्होंने सबसे ऊँची शाखा

पर अपना एक फरमान टाँगा,

धीरे-धीरे सहम गए पखेरू,

मौन हुआ वन, चुप हुआ पांगा।

एक नन्ही चिड़िया ने पूछा—

“क्या आकाश भी बिक जाता है?

क्या कोई एक पंखों वाला,

सबकी उड़ानें लिख जाता है?”

बूढ़े वृक्ष ने पत्ते हिलाए,

उसकी आँखों में जल था,

“जब तक प्रश्न हवा में जीवित हैं,

तब तक शेष बदल का पल है।”

अगली सुबह सभी पखेरू

एक साथ नभ में आए,

न किसी ने पंजे फैलाए,

न किसी के पंख झुकाए।

उन्होंने मिलकर घोंसलों से

एक नया संदेश उतारा—

“आकाश किसी एक का नहीं,

हर उड़ते पंख का है सहारा।”

बाजों ने फिर जाल बिछाए,

कुछ पंखों को स्वर्ण दिखाया,

कुछ को भय की रात दिखाई,

कुछ को ऊँचा पद दिलवाया।

लेकिन इस बार वृक्ष की जड़ में

एक बीज नया मुस्काया,

मिट्टी ने चुपचाप कहा—

“सत्य ने फिर सिर उठाया।”

वर्षों बाद वहाँ एक वन था,

जिसमें अनेक दिशाएँ थीं,

कहीं गीत थे, कहीं सवाल थे,

कहीं असहमति की छायाएँ थीं।

वृक्ष आज भी खड़ा वहीं है,

उसकी शाखाएँ कहती हैं—

जिस दिन प्रश्न डरेंगे मन में,

उस दिन जड़ें भी ढहती हैं।

लोकतन्त्र कोई ताज नहीं है,

जो सिर पर रखकर राज करे;

वह तो वह खुला हुआ आकाश है,

जिसमें हर पंख अपनी उड़ान भरे।

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