Sunday, 13 September 2026

आवाज / संजय वर्मा

 आवाज / संजय वर्मा

बेटियां शिक्षा के बाद 
 शादी हो कर जाती दूसरे घर में 
 जहाँ पर हर चेहरे/रिश्ते नए|
 
 माँ जब खाना खाती 
 तब ऐसा लगता 
 बेटी होती तो काम में 
 हाथ बटाती। 

कभी ऐसा लगता जैसे बेटी ने 
आवाज दी हो 
वार -त्योहारों पर आती उसकी यादें 
माँ की आँखों में 
बहने लग जाते आँसू। 

पडोसी /रिश्तेदार पूछते 
क्या हो गया 
झूठ -मूट कह देती 
कुछ नहीं। 

जिनकी बेटियाँ होती है 
वो ही इस आवाज के मर्म को समझ सकती 
बोल उठती 
क्या बेटी की याद आ रही है 
रोते हुए "हाँ " शब्द 
निशब्द बन जाते है।
 
 
रिश्तो कि फ़िल्म ही जीवन में
कुछ इस तरह चलती है 
पहला  भाग बाबुल का होता है
मध्यांतर हो जाता 
पिया का घर 
हक़दार बदल जाते है|
 
        यही तो जीवन का सच है 
वार -त्यौहारों पर 
किसी से बेटी कि शक्ल मिलने पर या आवाज सुनाई देने पर 
                 उसे मन निहारता रहता 
और आँखों से आँसू 
यादों के रूप में गिराता रहता । 

इसलिए हर इंसान के दिल में 
यादेँ बसाई  है 
जो मर्म को समझ कर 
इंतजार करवाती है और 
आँखों से आँसू गिरवाती है| 
 
फिर कोई पूछता है की 
क्या हुआ -क्या बिटियाँ  की 
याद आ रही है 
तब माँ कहती - "हाँ "
यही क्रम हर घर में चलता है 
जिनकी बेटियाँ होती है । 

संजय वर्मा"दृष्टि " 
125 शहीद भगत सिग मार्ग
मनावर जिला -धार (म प्र )

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