गाँधी - मनीषा प्रसन्न
सादगी का एक नाम गाँधी था जो,
आदर्शों और विचारों की आँधी था
निडरता उनका हथियार
और प्रेम उनका पैग़ाम था
एक दो लोग नहीं,
साथ उनके जन सैलाब था
भेदभाव उनका ग़ुलाम था
हिंसा उनसे घबराती थी और
अहिंसा उनकी साथी थी
हाथ में उनके दृढ़ इरादों की लाठी थी
उनके आगे बुराई सर झुकाती थी
कहने से उनके धर्म और मज़हब
गले मिलते थे
राम और रहमान एक रास्ते पर
संग चलते थे
कितने सुनहरे दिन थे वो
जब इस देश में गाँधी जैसे
आदर्श रहते थे
त्याग तपस्या और अहिंसा को
हथियार बना,करते थे विरोध,
जिसको वो संघर्ष कहते थे
गाँधी एक नाम नहीं,
एक व्यक्तित्व नहीं
दृढ़ता, मज़बूती और
अडिग रहने का अर्थ है
मरते दम तक ,
सच कहने का जुनून
बनावट और दिखावे से
दूर रहने का सुकून
देश के हालातों का इश्तहार थे वो
हौसलों और इरादों का संसार थे वो
कमज़ोरों और ग़रीबों की शक्ति
मानवता की भक्ति थे जो..
उनकी दुनिया में कोई सरहद नहीं
कहतेथे वो,इंसानियत की कोई हद नहीं
पर अफ़सोस ,आज हमें
गाँधी की क़द्र नहीं
अपने ही देश में निशाने ,
पर उनके आदर्श हैं ,
सवाल उठते हैं अब उनके संघर्ष पर
अपमानित होती हैं उनकी नीतियां
गाँधी के देश में ही, ये कैसी कुरीतियाँ
पर गांधी आज़ाद हैं सरहदों से,
निकल कर संकीर्णता की हदों से
व्याप्त हैं वो एक विचार बनकर
दुनिया में क़ायम हैं वो
शांति की पहचान बनकर
उनकी पहचान अब एक देश नहीं
उनसे पहचान है मानवता की …

मनीषा प्रसन्न
स्वरचित अप्रकाशित मौलिक
( मध्य प्रदेश)

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