वक्त की जंजीर ने - रजनी श्री बेदी
वक्त की जंजीर ने.. जकड़ा है मुझको इस कदर,
कैद हूं,पिंजरा खुला है..
उड़ने की ताकत नहीं।
उड़ गई तो लौट के.. आऊंगी फिर इस कैद में,
जख्मी पंखों से उड़ाने.. भरने की ताकत नहीं।
चहचहाना छोड़ा था.. अपनों में दुश्मन देख कर,
बोझ है रिश्तों का अब बस.. लड़ने की ताकत नहीं।
खुद से शिकवे मै करूं.. और हंस भी दूं नसीब पे,
दर्द का दरिया भरा है.. डूबने की ताकत नहीं।
पत्थर सी आँखें, जड़ हृदय.. और बेजान सा है तन मेरा।
इस दर्द को पहचान के..
अब कहने की ताकत नहीं।
पिंजरे में अपने गुम हूं मैं ..बची नहीं अब ख्वाहिशें,
खुद को कैसे और छल लूं.. छलने की ताकत नहीं।
वाह छला क्या खूब खुद को..रूह भी हंसने लगी,
खोई रजनी.. रजनी में भी .. ढूंढने की ताकत नही।
रजनी श्री बेदी
Rajasthan

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