प्लास्टिक छोड़ो, प्रकृति से नाता जोड़ो - डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "
उपशीर्षक :
प्रकृति की पुकार — भविष्य की ज़िम्मेदारी 
धरती माँ की आँखों में, आज नमी-सी छाई है,
मानव की ही भूलों ने, कैसी विपदा लाई है।
नदियों में विष घुलता जाए, सूनी हुई हरियाली,
प्लास्टिक के इस जाल ने, बिगाड़ी जग की लाली।
कहाँ गए वे निर्मल झरने, कहाँ गई वह छाँव,
कहाँ गए वन-पर्वत सुंदर, कहाँ गए वे गाँव?
पक्षी व्याकुल, पशु हैं घायल, सागर भी लाचार,
कूड़े में दम तोड़ रहा है, जीवन का संसार।
सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर, अब प्रतिबंध लगाएँ,
कपड़े के थैले अपनाकर, नव परिवर्तन लाएँ।
कागज़, मिट्टी, बाँस के साधन, फिर से अपनाएँ,
धरती के आँचल को मिलकर, स्वच्छ-स्वस्थ बनाएँ।
केवल कानूनों से कब तक, होगा जग कल्याण?
जब तक जन-जन में न जागे, कर्तव्य का ज्ञान।
बच्चे, बूढ़े, युवा सभी, लें संरक्षण की ठान,
हर घर, हर आँगन से गूँजे, पर्यावरण का गान।
नदियाँ केवल जलधारा नहीं, जीवन की हैं रेखा,
वृक्ष नहीं केवल लकड़ी हैं, इनसे साँसें देखा।
बूँद-बूँद जल बचाना है, पेड़ों को अपनाना है,
आने वाली पीढ़ी को, सुंदर कल दिलाना है।
आज अगर हम मौन रहे तो, कल पछताएँगे,
सूखी धरती, दूषित अम्बर, किसको दिखलाएँगे?
आज उठाएँ कदम अगर हम, कल मुस्काएगा,
फिर से अपना नीला अम्बर, धरती को सजाएगा।
नन्हे-नन्हे कदम हमारे, बड़ा बदलाव लाएँ,
मिल-जुलकर भागीदारी से, नव इतिहास बनाएँ।
प्रकृति की रक्षा करना ही, सच्चा धर्म हमारा,
स्वच्छ धरा और निर्मल अम्बर, हो अधिकार हमारा।
कलम मेरी अब मौन नहीं है, सच का दीप जलाएगी,
प्लास्टिक मुक्त धरा की खातिर, जन-जागृति फैलाएगी।
आओ मिलकर शपथ ये लें, कर्तव्य निभाएँगे,
धरती माँ की गोद को फिर, स्वर्ग समान बनाएँगे।
न प्लास्टिक का अत्याचार हो, न प्रकृति पर वार हो,
हर जीवन सुरक्षित हो, हरित धरा का संसार हो।
आज बचाएँ पर्यावरण, कल सुरक्षित होगा जहान,
प्रकृति बचेगी, तभी बचेगा, मानव का अभिमान! मेरी कलम मेरी पहचान —
प्रकृति का संरक्षण ही, मानवता का सम्मान!
डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "
Punjab

No comments:
Post a Comment