Monday, 21 September 2026

फ़र्ज़ राखी का - बलवान सिंह मानव

फ़र्ज़ राखी का - बलवान सिंह मानव


बहना ने बांधा है प्यार, भाई की कलाई में, 
करेगा रक्षा ये वादा, मांग है भाई से, 
क्यों, क्या करेगा रक्षा ?, अपनी इस बहन की,
दिलाएगा मुक्ति उस पीड़ा से, जो हमने है सहन की?
निभा दे अपना फ़र्ज़ भाई, अब ना किसी से डर, 
कर सामना इस दरिन्दों का, तू भी तो अब कुछ कर,
आखिर नोचते रहेंगे कब तक, हमें यूं ही ये भेड़िये, 
भाई पिता, चाचा, मामा, मौसा, सबकी खाल में छुपे भेड़िये,
ना औकात रही अब कुछ , हमें बार -2 ये नोचते हैं,
दिखाकर हैवानियत अपनी, खून से हाथ पोंछते हैं,
क्या होगा अब इस देश का, क्या होगी सुरक्षित हमारी जाति?
क्या होंगे अत्याचार बंद?,  जो हो रहे हम पर काफी,
सुनकर खून खौल उठा भाई का, मैं यह नहीं होने दूंगा, 
इस दरिन्दों को अब मैं , खून से हाथ धोने नहीं दूंगा, 
मैं लगा दूंगा पूरा जीवन, तुम बहनों की देखभाल में, 
नहीं चैन से बैठने दूंगा, जो भेड़िए छिपे हमारी खाल में, 
पर तुम बहनें भी अब, कम करो पाश्चात्य का दिखावा, 
शील - मर्यादा पर करो मनन, छोड़ दो नया पहनावा, 
सुनकर भाई की बात, बहना ने भी मन में बांधी,
"मानव " ने स्वीकारा फ़र्ज़, बहना ने भी राखी बांधी।।

       मौलिक एवं स्वलिखित रचना
       बलवान सिंह मानव

No comments:

Post a Comment