कुल्हाड़ी में लकड़ी हमारी पिरोई हुई है - डाॅ० योगेश सिंह धाकरे "चातक"
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पर्यावरण की रक्षा तो,
तेरा धर्म होना चाहिये ।
शत्रु कोई भी हो.....तेरा
तरू तो मित्र होना चाहिये ।
जीवनदाता है सभ्यतायों के,
इनके संरक्षण पर सवाल है ।
यें ही प्राण वायु के दाता हैं,
अस्तित्व पर ही तलवार है ।
प्राणवायु भी इनकी..
बिना मूल्य की दी हुई है ।
किन्तु कुल्हाड़ी मे लकड़ी,
हमारी ही पिरोई हुई है ।
हमारी साँसे जो चल रही है..
इनका ही तो उपकार है ।
प्राणवायु सहित अन्न से ही
जीवित समूचा संसार है ।
विनाश करा है वसुधा का..
जल थल नभ दुषित कर ।
बस दोहन कर पाया है तू
धरा को प्रदूषित कर ।
तेरी चाहतों का अन्त नही,
तुने किसी को नही छोड़ा है ।
प्रकृति हमारी शुभचिंतक थी,
हर मिथक को इसने तोड़ा है ।
करोना में कृत्रिम हवा के लिये,
कितनी व्यापक मारा मारी थी !
उन्होंने भी बहुत सिर पीटे थें..
जिनकी जेंबे अथाह भारी थी !!
एक पेड़ से जलाया जाता है.
तुझे मोक्ष की प्राप्ति के लिये !
मोक्षदाता को क्या दे पाता है..
तू मोक्ष के परिपेक्ष के लिये !!
मोक्ष पाता है प्राणवायु पाता है
रे मानव फिर भी नही अघाता है
हर तरह से, दोहन कर लेता है
पर तू,प्यार क्यों नही दें पाता है
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रचयिता....
डाॅ० योगेश सिंह धाकरे "चातक"
{ओज कवि} अलिराजपुर म. प्र
@ सर्वाधिकार सुरक्षित...©®
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