Monday, 24 November 2025

सफलता - दीपा शेखर झा "दिवा"

सफलता - दीपा शेखर झा "दिवा"

मेहनती मुसाफिर संघर्षों से नहीं डरता है
अपने मंजिल की खोज में चल पड़ता है।

सफलता आसानी से कहाँ  मिलता है।
सदा कठिन राह ही वह तय  करता है।

उठकर गिरता गिरकर मुसाफिर उठता है 
अपने हौसलों को सदा ही बुलंद रखता है।

मार्ग से ना भटका तो पूरी होगी आस
रब देगा साथ मन में रखता है विश्वास।

हर गलती से उसको सीख बहुत मिलता है
 फिर धीरे - धीरे सफलता की सीढ़ी चढ़ता है।

और असफलता को पीछे छोड़कर वह
सफलता के साथ आगे बढ़ता जाता है।

सफलता पाकर वह इतिहास रचता है
संसार में मुसाफिर का नाम गूंजता है।

उसका जीवन रौशनी से जगमगाता है 
 अपने भविष्य को  प्रकाशित करता है।

       दीपा शेखर झा "दिवा"
             दिल्ली 

ख़ुशी - नाज़रीन अंसारी ‘राफी’

ख़ुशी - नाज़रीन अंसारी ‘राफी’

ख़ुशी कोई वस्तु नहीं बल्कि जीवन को देखने का नज़रिया है। यह कभी धन में मिलती है, कभी संतोष में, कभी परिवार, दोस्तों के साथ और कभी अपने कर्तव्यों को निभाने में। मनुष्य जीवन में पूर्ण रूप से हमेशा ख़ुश नहीं रह सकता, क्योंकि दुख–सुख जीवन के दो पहिए हैं। दुख हमें मज़बूत बनाते हैं और सुख हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
मन की मज़बूती सबसे आवश्यक है। शरीर से मज़बूत बहुत लोग होते हैं, पर असली शक्ति मन की होती है। दुख आए तो घबराएँ नहीं, वह हमें सीख देने आते हैं। साफ नियत, ईमानदारी और मेहनत से किया गया हर कार्य सफलता और संतोष देता है। ख़ुशी बाँटने से बढ़ती है, दान, सेवा, सहयोग और प्रेम से ख़ुशियाँ दोगुनी हो जाती है ।
क्रोध से दूरी और प्रेम से नज़दीकी बढ़ती है। जीवन छोटा है, इसे मुस्कान, दोस्ती, मस्ती और बचपन-सी मासूमियत के साथ जीना चाहिए। 
जो हमारे साथ नहीं हुआ उसके लिए दुखी होने के बजाय अपनी कमी ढूँढ़कर उसे दूर कर आगे बढ़ना चाहिए। समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, पर हमारे कर्म और चरित्र ही भविष्य बनाते हैं।
ख़ुशी तलाशने से नहीं मिलतीं, बल्कि सही सोच, सही आचरण और सकारात्मक मन से स्वयं रास्ता बनता है। बस इतना याद रहे ख़ुशी है तो जीवन है।

नाज़रीन अंसारी ‘राफी’

दिल्ली

जीत - डॉ ० अशोक

जीत - डॉ ० अशोक

उगती किरणें
लय और ताल में ढलकर
जीत रचें सुर

मंद पवन बोले
छन्दों की सीढ़ियों पर
मन थिरक उठे

सारा सच साप्ताहिक
सच की रौशनी देकर
रास्ता दिखाए

नीला आकाश
ताल में अपनी बाँहें
खोलकर बुलाए

लय का झरना
पर्वत से उतरता
सुरों का स्पर्श

ताल की चाप
कदमों को सहलाते
छन्द बने संग

सारा सच साप्ताहिक
हफ्तों की धड़कन में
सच को सँवारे

फूलों की फुहार
लय-ताल की भाषा
जीत का गीत

चाँद की लोरी
छन्दों की परछाईं
नींद में भी गूँजे

लहरों का मन
ताल से ताल मिलाकर
सपनों को थामे

दीपक की लौ
लय के संग नाचे
अंधेरा भागे

क्षितिज पुकारे
छन्दों की पगडंडी से
जीत चले आगे

डॉ ० अशोक, पटना, बिहार।

मातम - डा अनन्तराम चौबे


 राष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारी वाणी 

साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 
विषय ....मातम 
नाम.. महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर मध्यप्रदेश 
कविता...   मातम

समय ने जब 
अपना चक्र चलाया
मां के दुखों का अन्त क्षण
भर में कर दिया सफाया ।

सारे रिश्ते नाते
ममता करूणा दया ।
मोह माया के रिश्तों में
ही सिमट कर रह गई ।
कल तक जो सभी के
बीच  अचेतन थी
जीवन के अन्त को
क्षण भर में पा गई ।

बस कुछ ही क्षणों में
सभी क्रन्दन में लग गये ।
कुछ बुजुर्ग , ज्ञानी
सारा सच मन ही मन 
भाव विभोर हो गये ।

खुशी का माहोल 
मातम में बदल गया।
मां के जीवन का क्षण
 भर में अंत हो गया ।

सभी जानते है जीवन 
का कटु सत्य यही है ।
जीवन के साथ मृत्यु हर
 किसी की एक दिन अटल है ।

यहां पर जो भी आया है
एक न एक दिन जायेगा ।
सभी बन्धनों रिश्तो को
यही पर त्याग जायेगा ।

 सारा सच कल तक सभी
ममतामयी मां को देखकर 
ईश्वर से प्रार्थना दुआ
बंदना भीख मांग रहे थे ।
मृत्यु सैया में पड़े
उस जर्जर शरीर को
दुखी मन से देख रहे थे ।

असीम कष्टों दुखों वेदना
को सहती उस मां  को
जो हड्डियों  का  ढांचा
बनी पड़ी कराहती थी ।
तड़फती थी न जाने
क्या क्या बड़बड़ाती थी ।

होश था न हवास था
खाने की न पीने  की
मन मे कोई आस थी ।
क्योंकि अन्त का जो 
समय आ गया था ।

जो न किसी ने सोचा था
न किसी  ने जाना था ।
मां के जीवन के अन्त ने
सभी को रुला दिया ।
मां के अन्त ने आज 
मातम क्षण दिखा दिया ।

अन्त के साथ सभी
क्षण भर में अंतिम 
विदाई मे लग गये ।
कुछ अन्त होने  की
खबर देने में लग गये ।
कुछ आपसी कुछ
कुछ करीबी कफन की
तैयारी मे लग गये ।

सारा सच कुछ ही समय में
मृत शरीर के ढांचे को
पंच तत्वों मे मिला दिया ।
सभी ने मिलकर कफन का
अंतिम दस्तूर पूरा कर दिया ।

वाह रे जीवन वाह रे
जीवन का ये अन्त
एक दिन सभी का आयेगा ।
और क्षण भर में पंच तत्वों
में विलीन हो जायगा ।
माता पिता भाई बहिन 
सभी रिश्ते नातेे यही
पर छूटकर रह जायेगें ।
न कोई तेरा न मेरा
सब यहीं छूट जायेगे ।
बस मातम का माहोल
परिवार में छोड़ जायेंगे।
         
महाकवि डा अनन्तराम चौबे
    जबलपुर म प्र

खुशी - अलका जैन आनंदी


खुशी - अलका जैन आनंदी

पांच जून उत्तम दिवस, रक्तदान को मान।

 ध्यान रख *खुशी* से करो, देता जग सम्मान।।

*गीत, खुशी* 16,11 सरसी छंद

गौरव गाथा सारे गाते, प्यारा हिंदुस्तान।
शीश उठाए अडिग हिमालय,भारत देश महान ।।

*खुशी* हृदय सैनिक को बोले,कहे सभी अनमोल।
प्राण *खुशी* से हस न्यौछावर,बजे कहीं पे ढोल।।
कहे स्वर्ण की चिड़िया भारत,दुनिया दे सम्मान।
गौरव गाथा सा...1

नदियां झरने कल-कल बहते,तुलसी है घर-द्वार।
भिन्न यहां पर भाषा बोली,  *खुशी* एकता प्यार ।। 
दूध दही मनचाही खाना, पंजाब करे मान।
 गौरव गाथा सारी गाते, प्यारा हिंदुस्तान।।.2

बुद्ध शिवा महावीरा विष्णु,इसी धरा के राम।
जिनवाणी का पाठ पढे सब,पढ़ते सब निज धाम।।
लोग चंद्रगुप्त चाणक्य से,भरा पड़ा था ज्ञान।
गौरव गाथा..3

अलका जैन आनंदी
दिल्ली