जापान की सफलता के राज़
सफलता, सेहत और संस्कारों का असली राज़
दुनिया में क्यों छाया है जापान? क्या आप जानते हैं कि जापानी लोग इतने सफल क्यों हैं? इसका जवाब उनके बचपन में छिपा है। जापान के लोगों की सफलता और उनकी कार्यकुशलता के पीछे उनकी खास जीवनशैली, अनुशासन और बचपन से मिले संस्कार मुख्य वजहें हैं। जापानी संस्कृति और समाज को सफल बनाने वाले मुख्य कारणों में सबसे पहली चीज़ है घर से शुरुआत। जापान में बच्चों को बहुत कम उम्र से ही अपने छोटे-मोटे काम खुद करना सिखाया जाता है। असली रहस्य घर से ही शुरू होता है। जब नन्हे-मुन्ने बच्चे कपड़े समेटना, जूते सही जगह रखना और खुद सफाई करना सीखते हैं, तो उनके दिलों में आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास का दीया जलता है। स्कूल और घरों में सफाई करने और अपनी गलतियों की जिम्मेदारी लेने से उनमें नागरिक चेतना और दूसरों के प्रति आदर पैदा होते हैं। यही वजह है कि वहां अपराध की दर इतनी कम है, क्योंकि वहां हर इंसान बचपन से ही दूसरों के अधिकारों को अपनी जान से बढ़कर सम्मान देना सीखता है।
अब सवाल यह है कि जापान के लोग इतनी मेहनत क्यों करते हैं? दरअसल, उनकी कार्य संस्कृति में कड़ी मेहनत, ईमानदारी और नए-नए तरीके खोजने की कला बसी हुई है। जापानी लोग किसी भी काम या शोध को बहुत बारीकी, लगन और गहराई से करते हैं। सबसे भावुक करने वाली बात यह है कि वे व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर अपने देश और समाज के हित को रखते हैं, जिससे पूरा राष्ट्र एक अटूट परिवार की तरह आगे बढ़ता है। वे मानते हैं कि समय की बर्बादी देश की बर्बादी है। दूसरी ओर, हमारे अपने प्यारे भारत में हम अक्सर "चलता है" वाले रवैये और आलस की वजह से पीछे रह जाते हैं। हम अपने देश में ऐसा इसलिए नहीं कर पा रहे क्योंकि हम सफाई और नियमों को दूसरों की जिम्मेदारी मानकर छोड़ देते हैं। अपने देश भारत को सफलता के शिखर पर ले जाने के लिए हम जापान से वक्त की पाबंदी, राष्ट्रप्रेम और निस्वार्थ स्वच्छता की सीख ले सकते हैं।
जापानियों की लंबी उम्र, मुस्कुराती सेहत और हर हाल में खुश रहने का राज़ उनके खान-पान, जीवन दर्शन और सकारात्मक सोच में छिपा है। वहां संतुलित खान-पान को जीवन का अमृत माना जाता है। जापानी लोग ताजा और मौसमी खाना पसंद करते हैं। उनकी डाइट में सी-फूड और सब्जियों की मात्रा अधिक होती है, जबकि नमक और मसालों का इस्तेमाल कम होता है। इसके साथ ही वे 'हारा हची बू' नियम का पालन करते हैं, यानी पेट भरकर ठूंसने के बजाय सिर्फ 80% ही भोजन करते हैं। इससे शरीर हल्का, दुरुस्त और बीमारियों से दूर रहता है। जापान के लोग हर हाल में खुश इसलिए रहते हैं क्योंकि वे वर्तमान में जीना पसंद करते हैं, छोटी-छोटी बातों में खुशियाँ तलाशते हैं और कभी दूसरों से अपनी तुलना नहीं करते। इसके अलावा, 'इकिगाई' यानी जीने का सच्चा मकसद या लक्ष्य ढूंढने की जापानी सोच उन्हें उम्रभर मानसिक रूप से सक्रिय और तनावमुक्त रखती है। जब जीवन में हर सुबह उठने की एक सही और खूबसूरत वजह होती है, तो इंसान कभी नहीं थकता या हारता।
अभिभावकों के लिए एक सीधा और दिल से निकला संदेश यह है कि बच्चों को सिर्फ किताबी ज्ञान की दौड़ में न दौड़ाएं, बल्कि उन्हें घर के छोटे-छोटे कामों से अपनों का हाथ बंटाना सिखाएं। जब बच्चा अपने कमरे की सफाई खुद करेगा, तो वह बड़ा होकर इस देश को अपनी मां मानकर कभी गंदा नहीं करेगा। घर के कामों से बच्चों को अनुशासन, समय प्रबंधन और मेहनत की असली कीमत समझ आती है। अगर हम चाहते हैं कि हमारा तिरंगा भी दुनिया में सबसे ऊँचा लहराए, तो हमें जापानी जीवनशैली के इन बेहतरीन संस्कारों को अपने घरों के आंगन से शुरू करना होगा। बच्चों में यह आदत डालना कि अपना काम स्वयं करें और दूसरों की मदद करें, राष्ट्र निर्माण की सबसे पवित्र और मजबूत सीढ़ी है।
मेरे प्यारे नन्हे दोस्तों और उनके सुपर पेरेंट्स, जौली अंकल के अनुभव से समझो कि हम भारतीय लोग भी दिल के बहुत अच्छे हैं, लेकिन जब साफ़-सफाई और टाइम की बात आती है तो बोलते हैं, "अरे भाई, बस 5 मिनट में पहुंच रहा हूं" और वो 5 मिनट में पूरी महाभारत बीत जाती है। हम लोग नई-नई चीजें खोजने की जगह 'जुगाड़' में उस्ताद हैं, लेकिन भाई, मज़ाक अपनी जगह और देश का मान अपनी जगह। अगर लाइफ में वाकई सच्चा हीरो बनना है और अपने भारत का नाम पूरी दुनिया में रोशन करना है, तो जापानी लोगों की तरह समय के पक्के बनो, अपना हर काम खुद करो और खाली पेट 'हारा हची बू' अपनाकर थोड़ा कम खाया करो। जब आप अपनी ख़ुशी से अपने छोटे-छोटे काम खुद करने लगोगे, तो आपका चेहरा भी चमकेगा और देश भी। अगर आप 'जापान की सफलता के राज़' को अपनी जिंदगी में उतार लेंगे, तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। तो चलो, आज ही अपने जौली अंकल से वादा करो कि अभी से ही आलस को टाटा-बाय-बाय कहेंगे, जापानी अनुशासन अपनाएंगे और अपने भारत को दुनिया का सबसे प्यारा और महान देश बनाएंगे।
- जौली अंकल –
Delhi