Saturday, 26 September 2026

हाय! ये मुसीबत फिर लौट आई है - दीपिका पाल

हाय! ये मुसीबत फिर लौट आई है - दीपिका पाल 

UPI के चार्ज ने क्या महंगाई बढ़ाई हैं..

पहले हम तो बस UPI -UPI करते थे

अब तो पैसे निकालने पर चार्ज है इसके लिए डरते है...

देश में इन दिनों UPI चार्ज को लेकर मामला गर्म है। सरकार के ऐलान के बाद आम आदमी वर्ग से लेकर व्यापारियों में खासी नाराज़गी का माहौल है। होना भी तय है, सरकार ने 2000 रूपये के पेमेंट पर निर्धारित चार्ज लगाकर बड़ा झटका दिया है वहीं इसके पीछे एक तर्क भी दिया है। सरकार ने इस साहसी कदम को सरकारी सब्सिडी पर निर्भरता खत्म करने और देश में नवाचार को बढ़ाने का रास्ता बताया है।

जाहिर सी बात है, इस पेमेंट शुल्क से गुस्सा तो होगा ही, पहले जहां हम छोटे से बड़े खर्चे में बस फोन उठाकर UPI कर लेते थे लेकिन अब ज्यादा भुगतान का शुल्क भी देना पड़ेगा।

सरकार समय - समय पर बदलाव करती है ये तो जानते है लेकिन इस कदम से एक बात तो समझ आई है नगद पैसे पास में होना जरूरी है UPI जैसी आसान सुविधा भी धोखा दे सकती है।

अभी तो सिर्फ सरकार ने बस 2000रु के पेमेंट पर शुल्क लगाने की बात की है क्या पता आने वाले समय में नए नियम जोड़ न दे जिसका ख़ामियाजा दैनिक जीवन में उठाना पड़े।

तो अंत में एक मुहावरा याद आता है, ध्यान से सुनिएगा...

रामचंद्र कह गए सिया से, ऐसा कलयुग आएगा,

हंस चुगेगा दाना दुनका, कौवा मोती खाएगा।

यानी यहां कलयुग की बात है भाई.. जैसे UPI के आने से जनता के बीच में हाहाकार मच गया वही अब इसका अगला कदम क्या होगा और असर, ये सब सरकार के दिमाग पर निर्भर है।

दीपिका पाल 
मध्य प्रदेश 

तिरंगे की छांव - सुनीता बिश्नोई

तिरंगे की छांव - सुनीता बिश्नोई

 
तिरंगे कि छांव मुझे बहुत भाती हैं,
केसरिया में सुबह की लाली,
सफेद में माँ जैसी ठंडी छांव,हरे में खेतों की हरियाली।
 
बीच में चक्र घूमे गोल-गोल,
जैसे कहे बेटी आगे बढ़ो,
न रुकना है, न झुकना है,
बस देश का नाम रोशन करना है।
 
इस छांव में पले मेरे सपने,
इस छांव में मिली मुझे उड़ान,
जवान खड़े हैं सरहद पर,
तभी तो घर में है खुशी और सुकून।
 
तिरंगे कि छांव सबसे न्यारी,
इसी में बसा है मेरा संसार,
इसी छांव में जीना है मुझे,
इसी छांव में हैं मेरा, प्यार,
 
सुनीता बिश्नोई
जिला श्री गंगानगर (राजस्थान)
 
स्वरचित एवं मौलिक ओर अप्रकाशित हैं।।
 

मेरी कलम में बची हुई मैं - सोबिया राशिद

मेरी कलम में बची हुई मैं - सोबिया राशिद  
उत्तर  प्रदेश 

श्रेणी: नज़्म
शीर्षक: मेरी कलम में बची हुई मैं

मेरी कलम में बची हुई मैं

जब सब कुछ कहने को था,
तब शब्द कम पड़ गए थे।
और जब कहने को कुछ नहीं बचा,
तब मेरी कलम चल पड़ी।

शायद लिखना
काग़ज़ पर शब्द उतारना नहीं होता,
शायद लिखना वह रास्ता है
जिस पर चलते-चलते
इंसान एक दिन
अपने ही भीतर पहुँच जाता है।

मैंने भी कभी
बहुत यक़ीन से मोहब्बत लिखी थी—
कुछ नामों को
अपनी दुआओं में रखा,
कुछ चेहरों को
अपनी कविताओं में,
और कुछ ख़्वाबों को
इतना अपना समझ लिया
कि उनके टूटने का ख़याल भी
अजनबी लगता था।

फिर वक़्त आया।

वह किसी तूफ़ान की तरह नहीं आया था,
न उसने कोई शोर किया,
न कोई दरवाज़ा ज़ोर से बंद किया।

बस धीरे-धीरे
कुछ आवाज़ें दूर होती गईं,
कुछ लोग बदलते गए,
कुछ रिश्तों के बीच
ख़ामोशी बढ़ती गई,
और कुछ ऐसे सवाल
मेरे भीतर रह गए
जिनके जवाब
किसी के पास नहीं थे।

मैंने बहुत दिनों तक
वक़्त से नाराज़ रहना चाहा।

मुझे लगता था
उसने मुझसे बहुत कुछ छीन लिया है।

फिर एक रात
बहुत देर तक जागने के बाद
मैंने अपनी पुरानी डायरी खोली।

कुछ पन्नों पर
स्याही धुँधली थी,
कुछ पर आँसुओं के निशान थे,
और कुछ पन्ने ऐसे थे
जिन पर मैंने बहुत कुछ लिखकर भी
कुछ नहीं कहा था।

मैं उन्हें पढ़ती रही।

और पहली बार
मुझे अपने पुराने शब्दों पर
तरस नहीं आया।

मुझे अपनी ही आवाज़ सुनाई दी।

एक ऐसी लड़की की आवाज़
जो हर रिश्ते को बचाना चाहती थी,
हर दूरी को मिटाना चाहती थी,
हर ख़ामोशी का मतलब जानना चाहती थी—
और इस कोशिश में
धीरे-धीरे
ख़ुद से दूर होती जा रही थी।

उस रात
मुझे समझ आया—

कुछ लोग
हमारी ज़िंदगी में रुकने के लिए नहीं आते,
वे हमारे भीतर
एक दरवाज़ा खोलकर चले जाते हैं।

कुछ रिश्ते
पूरा होने के लिए नहीं,
हमें पूरा करने के लिए आते हैं।

और कुछ बिछड़ने
हमें किसी और से नहीं,
हमसे मिलाने आते हैं।

मैंने उस दिन
अपना दर्द मिटाया नहीं।

बस उसे
एक जगह दे दी।

काग़ज़ पर।

फिर मैंने लिखना शुरू किया।

पहले किसी के लौट आने की उम्मीद में नहीं—
बस इसलिए कि
मेरे भीतर जो कुछ जमा था,
वह साँस ले सके।

कभी एक अधूरी कविता बनी,
कभी दो पंक्तियाँ,
कभी पूरा पन्ना
सिर्फ़ ख़ामोशी से भर गया।

कई बार
मैंने लिखकर पन्ना फाड़ दिया।

कई बार
एक ही वाक्य के सामने
घंटों बैठी रही।

और कई बार
जो कहना चाहती थी,
उसके लिए शब्द ही नहीं मिले।

तब जाना—
हर भावना को
नाम देना ज़रूरी नहीं होता।

कुछ दर्द
बस महसूस किए जाते हैं।

कुछ रिश्ते
बस याद किए जाते हैं।

और कुछ अध्याय
बस बंद कर दिए जाते हैं।

वक़्त ने मुझे
सब कुछ वापस नहीं दिया।

उसने मुझे
वह इंसान भी वापस नहीं दिया
जिसे मैं खो चुकी थी।

उसने कोई बीता हुआ दिन
मेरे लिए नहीं रोका।

लेकिन उसने एक और चीज़ दी—

नज़र।

चीज़ों को
पहले जैसा नहीं,
थोड़ा गहरा देखने की नज़र।

अब मैं जानती हूँ
कि हर ख़ामोशी नाराज़गी नहीं होती,
हर दूरी बेवफ़ाई नहीं होती,
हर अंत हार नहीं होता
और हर अधूरापन
अर्थहीन नहीं होता।

कुछ अधूरी चीज़ें
हमारे भीतर
पूरी उम्र बोलती रहती हैं।

शायद इसीलिए
मेरी कविताओं में
आज भी मोहब्बत है।

मगर अब मोहब्बत के साथ
उसकी परछाईं भी है।

अब मैं सिर्फ़
किसी के आने की कहानी नहीं लिखती,
उसके जाने के बाद
बची हुई ख़ामोशी भी लिखती हूँ।

मैं सिर्फ़
इंतज़ार नहीं लिखती,
उस दिन को भी लिखती हूँ
जब इंसान
इंतज़ार करना छोड़कर
खिड़की खोल देता है।

मैं सिर्फ़
टूटना नहीं लिखती,
उन हाथों को भी लिखती हूँ
जो बिखरे हुए टुकड़ों को
धीरे-धीरे समेटना सीखते हैं।

और शायद
वही हाथ मेरे थे।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ,
तो लगता है—
मैं जितनी बार टूटी,
उतनी बार लिखी गई।

हर चोट ने
मेरी भाषा में एक शब्द जोड़ा।

हर विदाई ने
एक विराम।

हर इंतज़ार ने
एक गहरी साँस।

और हर बार
जब मुझे लगा कि
मेरी कहानी यहीं ख़त्म हो गई,
मेरी कलम ने
अगला पन्ना खोल दिया।

अब मेरी कलम
किसी को पाने के लिए नहीं लिखती।

किसी को भूलने के लिए भी नहीं।

वह बस उन बातों को
जगह देती है
जो बोलते-बोलते
हमारे भीतर रह जाती हैं।

उन आँखों को
जिन्होंने रोना छुपाकर
मुस्कुराना सीखा।

उन लोगों को
जो सबके लिए मज़बूत रहे
और रात में
चुपचाप अपने तकिए से
कमज़ोर होने की इजाज़त माँगते रहे।

उन दिलों को
जो किसी के जाने के बाद
यह सोचते रहे—

“क्या मेरे भीतर अब भी
कुछ बचा है?”

हाँ।

बहुत कुछ बचा है।

एक सुबह बची है।

एक अधूरी कविता बची है।

एक ख़ाली पन्ना बचा है।

एक ऐसी हँसी बची है
जो अभी लौटनी बाकी है।

और सबसे बढ़कर—

ख़ुद से मिलने की
एक और कोशिश बची है।

मेरे लिए लिखना
यही कोशिश है।

जब दुनिया ने पूछा—
“तुम्हें क्या मिला?”

मेरी कलम ने पूछा—
“तुमने ख़ुद को कितना समझा?”

जब लोगों ने मेरी कहानी में
मोहब्बत ढूँढ़ी,
मुझे उसमें अपना सफ़र मिला।

जब किसी ने मेरे शब्दों में
बिछड़ना पढ़ा,
मैंने उनमें लौटना पढ़ा।

और जब किसी ने कहा—
“ये तो मेरी कहानी है,”
तब मुझे पहली बार लगा
कि शायद लेखक होना
अपनी कहानी कहना भर नहीं है।

शायद लेखक होना
अपने भीतर की सच्चाई को
इतनी ईमानदारी से लिख देना है
कि कोई अनजान इंसान भी
उसमें अपना चेहरा देख सके।

आज मेरी पहचान
किसी नाम से बड़ी नहीं,
किसी रिश्ते से छोटी नहीं।

मेरी पहचान
उन शब्दों में है
जिन्हें मैंने अपने हिस्से की ख़ामोशी से जन्म दिया।

मैंने वक़्त को लिखा,
तो उसने मुझे धैर्य दिया।

मैंने दर्द को लिखा,
तो उसने मुझे संवेदना दी।

मैंने मोहब्बत को लिखा,
तो उसने मुझे ख़ुद से मिलना सिखाया।

और मैंने ख़ुद को लिखा—
तो जाना,

जिसे मैं इतने वर्षों से
दुनिया में ढूँढ़ रही थी,
वह कहीं गया ही नहीं था।

वह यहीं था—

मेरी आवाज़ में,
मेरी ख़ामोशी में,
मेरी अधूरी पंक्तियों में,
मेरी उस कलम में
जिसे मैंने जाने कितनी बार
रख देना चाहा,
मगर हर बार
उठा लिया।

इसलिए आज
मैं अपनी कलम से
कोई वादा नहीं करती।

बस उसे चलने देती हूँ।

कभी मोहब्बत की तरफ़,
कभी वक़्त की तरफ़,
कभी दर्द की तरफ़,
और कभी
सीधे अपने भीतर।

क्योंकि अब मैं जानती हूँ—

कुछ कहानियाँ
किसी और के लौटने पर पूरी नहीं होतीं।

वे उस दिन पूरी होती हैं
जब हम ख़ुद से
दोबारा मिलते हैं।

और मेरी कहानी भी
शायद वहीं से शुरू हुई थी—

जहाँ मुझे लगा था
कि सब ख़त्म हो गया।

मैंने उस ख़ामोशी को
एक पन्ना दिया।

पन्ने को शब्द।

शब्दों को आवाज़।

और आवाज़ ने
मुझे मेरी पहचान लौटा दी।

अब मेरी कलम में
बहुत-सी कहानियाँ हैं—

कुछ मेरी,
कुछ तुम्हारी,
कुछ उन लोगों की
जिनसे मैं कभी मिली भी नहीं।

लेकिन उन सबके बीच
एक चीज़ हमेशा रहेगी—

मैं।

वह मैं
जो बहुत कुछ खोकर भी बची रही।

वह मैं
जिसने रोते हुए भी लिखा।

वह मैं
जिसने टूटकर भी
शब्दों को टूटने नहीं दिया।

और शायद
एक लेखक की सबसे सच्ची पहचान
यही होती है—

कि वह अपने बिखरे हुए हिस्सों को
स्याही में मिला दे,

और फिर
जब कोई दूसरा
उसकी रचना पढ़े,

तो उसे
अपने भीतर का कोई खोया हुआ हिस्सा
वापस मिल जाए।

मैंने बहुत कुछ लिखा है।
मगर सच यह है—
हर बार जब मेरी कलम चली,
उसने किसी और की कहानी नहीं,
मुझे ही थोड़ा-थोड़ा लिखा।

यही मेरी कलम है।
यही मेरी आवाज़ है।
और जो कुछ मेरी कलम में बचा रह गया—
वही मेरी पहचान है।

नीरव नभ में चाँद खिला - निवेदिता शुक्ला

नीरव नभ में चाँद खिला -  निवेदिता शुक्ला

नीरव नभ में चाँद खिला 
झरती रजनी उजियारी ,
वन पथ पर चुपचाप चली 
जैसे सपनों की सुकुमारी ।

मंद पवन ने चुरा लिया 
फूलों के अधरों का मधुर गान ,
ओस कणों में मुस्काया फिर 
भोर का कोमल अरुणिम प्राण ।

दूर क्षितिज के पार कहीं 
मन का दीपक जलता है,
अनजाने किसी मधुर मिलन को 
हृदय निरंतर चलता है।

कौन पुकारे नीरवता में 
ये कौन छुए मन के सुप्त तार ,
चांँद उतर कर पूछ रहा 
किसका है ये मधुर इंतज़ार?

निवेदिता शुक्ला
इटावा, उत्तर प्रदेश

Monday, 21 September 2026

आशीर्वाद : जीवन की अमूल्य पूँजी - उज़मा तरन्नुम

आशीर्वाद : जीवन की अमूल्य पूँजी - उज़मा तरन्नुम

भारतीय संस्कृति में आशीर्वाद का विशेष महत्व है। यह केवल कुछ शुभ शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि किसी व्यक्ति के प्रति प्रेम, स्नेह, शुभकामना और मंगलभावना की अभिव्यक्ति है। हमारे संस्कारों में बड़ों के चरण स्पर्श करके उनका आशीर्वाद लेना सम्मान और विनम्रता का प्रतीक माना जाता है। माता-पिता, गुरुजनों और बुजुर्गों का आशीर्वाद व्यक्ति के जीवन में आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

आशीर्वाद का सबसे सुंदर रूप हमें माता-पिता के स्नेह में देखने को मिलता है। माता-पिता अपने बच्चों की सफलता, सुख और उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं। उनके मुख से निकले हुए शुभ शब्द बच्चे के लिए प्रेरणा बन जाते हैं। जीवन में जब कठिन परिस्थितियाँ आती हैं, तब यही आशीर्वाद व्यक्ति को आगे बढ़ने का साहस देता है। इसलिए कहा जाता है कि माता-पिता का आशीर्वाद जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति है।

भारतीय परंपरा में गुरु का आशीर्वाद भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। गुरु केवल ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि जीवन को सही दिशा भी प्रदान करते हैं। विद्यार्थी जब गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करता है, तो उसमें अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का विश्वास मजबूत होता है। गुरु का आशीर्वाद ज्ञान, अनुशासन और संस्कारों के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

आशीर्वाद का संबंध केवल बड़ों से ही नहीं है। जब हम किसी छोटे या अपने प्रिय व्यक्ति को सफलता, सुख और अच्छे भविष्य की शुभकामना देते हैं, तब वह भी आशीर्वाद का ही एक रूप है। सच्चे आशीर्वाद में किसी स्वार्थ की भावना नहीं होती। इसमें केवल दूसरे के कल्याण की कामना निहित रहती है।

आज के आधुनिक और व्यस्त जीवन में पारिवारिक संबंधों में दूरी बढ़ती जा रही है। ऐसे समय में आशीर्वाद जैसी परंपराएँ हमें अपनी संस्कृति और मूल्यों से जोड़ती हैं। यह हमें सिखाता है कि जीवन में ज्ञान, सफलता और धन के साथ-साथ प्रेम, सम्मान और संस्कार भी आवश्यक हैं।

अंततः कहा जा सकता है कि आशीर्वाद जीवन की वह अमूल्य पूँजी है, जो दिखाई नहीं देती, लेकिन व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है। बड़ों का आशीर्वाद हमें कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति देता है और हमारे जीवन-पथ को आशा तथा विश्वास से भर देता है। इसलिए हमें सदैव अपने माता-पिता, गुरुजनों और बुजुर्गों का सम्मान करना चाहिए और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।

Uzma taranum
Karnataka

फ़र्ज़ राखी का - बलवान सिंह मानव

फ़र्ज़ राखी का - बलवान सिंह मानव


बहना ने बांधा है प्यार, भाई की कलाई में, 
करेगा रक्षा ये वादा, मांग है भाई से, 
क्यों, क्या करेगा रक्षा ?, अपनी इस बहन की,
दिलाएगा मुक्ति उस पीड़ा से, जो हमने है सहन की?
निभा दे अपना फ़र्ज़ भाई, अब ना किसी से डर, 
कर सामना इस दरिन्दों का, तू भी तो अब कुछ कर,
आखिर नोचते रहेंगे कब तक, हमें यूं ही ये भेड़िये, 
भाई पिता, चाचा, मामा, मौसा, सबकी खाल में छुपे भेड़िये,
ना औकात रही अब कुछ , हमें बार -2 ये नोचते हैं,
दिखाकर हैवानियत अपनी, खून से हाथ पोंछते हैं,
क्या होगा अब इस देश का, क्या होगी सुरक्षित हमारी जाति?
क्या होंगे अत्याचार बंद?,  जो हो रहे हम पर काफी,
सुनकर खून खौल उठा भाई का, मैं यह नहीं होने दूंगा, 
इस दरिन्दों को अब मैं , खून से हाथ धोने नहीं दूंगा, 
मैं लगा दूंगा पूरा जीवन, तुम बहनों की देखभाल में, 
नहीं चैन से बैठने दूंगा, जो भेड़िए छिपे हमारी खाल में, 
पर तुम बहनें भी अब, कम करो पाश्चात्य का दिखावा, 
शील - मर्यादा पर करो मनन, छोड़ दो नया पहनावा, 
सुनकर भाई की बात, बहना ने भी मन में बांधी,
"मानव " ने स्वीकारा फ़र्ज़, बहना ने भी राखी बांधी।।

       मौलिक एवं स्वलिखित रचना
       बलवान सिंह मानव

‌मीडिया - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

‌मीडिया - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' 

'मीडिया' शब्द अंग्रेजी शब्द मीडियम का बहुवचन है, जिसका अर्थ है माध्यम।
खबरों के आदान-प्रदान का है मीडिया एक माध्यम।
मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है।
मीडिया हमारी जानकारी बढ़ाता, हमारे  व्यक्तित्व में निखार लाता है।
तीन प्रकार की मीडिया होती है प्रिंट, 
इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल।
मीडिया हमारी जिज्ञासा शांत करता है, खबरों की जानकारी देता पल-पल।
प्रिंट मीडिया में कागज पर छपी सामग्री हमें मिलती है।
किताबें और पत्रिकाएं बहुत लाभदायक होतीं, हमारा सही मार्गदर्शन करती हैं।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेडियो, टेलीविजन, विश्व की
खबरें हमें बताता है।
विश्व में घट रही घटनाओं को, हमें घर बैठे दिखलाता है।
डिजिटल मीडिया की बात अलग है, फेसबुक, व्हाट्सएप इंस्टाग्राम, वेबसाइट, पॉडकास्ट हमें दुनिया के किसी भी कोने तक पहुंचाता है।
मीडिया हमें आसपास की और दूर की खबरों से अवगत कराता है।
मीडिया मानो दूरियाँ खत्म कर देता, परिवार के सदस्यों,  दोस्तों को यह जोड़ पाता है।
हमारा दिल उदास हो, मीडिया करता है हमारा मनोरंजन।
तनाव कम करने का, मीडिया एक है बहुत अच्छा साधन।
मीडिया के लिए जो खबरें लाते हैं,
वे हैं पत्रकार।
जान जोखिम में डालकर, लाते समाचार। 
ताजा खबर हम तक पहुँचाते, विश्व का हमको मिलता ज्ञान। 
लोगों को जागृत करते, करते खतरों से सावधान।
खबर इकट्ठा करते, निष्पक्ष होकर करते काम। 
समाचार जन-जन तक पहुँचाते, करते नहीं आराम। 
निर्भीक होकर करते काम।
कमज़ोर की आवाज बनते, मेहनत कर देते काम को अंजाम।
कितनी तकलीफ सहकर  खबरें लाते, फिर भी चेहरे पर मुस्कान रहती है।
सच्चाई सामने लाकर, इनको खुशी मिलती है।
ये पत्रकार ही हैं जो हम सबको जोड़े रखते हैं‌।
समाज के हित के लिए वे सदा समर्पित
रहते हैं।
चुनौतियों का सामना करते, देते हर पहलू पर ध्यान।
समाज की उन्नति में, होता इनका बहुत योगदान।
मीडिया पर हमें भरोसा करना चाहिए, उसका साथ देना चाहिए।
सही खबर पहुंचाने में, हमें मीडिया की मदद करनी चाहिए।

डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' 
वैस्ट बंगाल 

पत्रकार - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त

अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारीवाणी साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 
विषय... पत्रकार - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त 

कविता... पत्रकार 

पत्रकार पत्रकारिता करता
सच्ची खबर को सामने लाता ।
सारा सच अन्याय जहां भी होता है 
उसके खिलाफ आवाज उठाता ।

सरकार चलाने स्तंभ तीन है
चौथा स्तंभ पत्रकारिता भी है।
मीडिया सरकार का हिस्सा नहीं है
फिर भी पत्रकार की भूमिका है ।

आम जनता को न्याय मिले न
तब मीडिया ही न्याय दिलाती है।
न्यायपालिका हो विधायिका हो
कार्यपालिका की पोल खोलती है ।

सच्चाई पर से जब पर्दा उठता है
दूध का दूध पानी का पानी होता है ।
भ्रष्टाचार हुआ हो चाहे या फिर
जिससे जो भी काम गलत होता है ।

सारा सच सच्चाई , भ्रष्टाचार से पर्दा
उठाने में पत्रकारिता का रोल होता है।
सच्चाई जब सबके सामने आती है
सच और झूठ का भेद खुलता है ।

ऐसे ही काले कार नामों को
मीडिया के माध्यम से खुलते हैं ।
कितना भी ताकतवर हो व्यक्ति
या सत्ता की कुर्सी पर रहते हैं ।

झूठ छुपाकर बच नहीं पाते
सच्चाई को हरा नहीं पाते हैं।
मीडिया ने जब पोल खोल दी
उसको कोई छुपा नहीं पाते हैं ।


प्रिंट मीडिया इलेक्ट्रानिक मीडिया
अब सोसल मीडिया भी आया है ।
यही मीडिया के ही स्तंभ तीन है
पत्रकारिता से हर कोई घबराया है।

हर गली मोहल्ला गांव शहर देश
में भी मीडिया ने जाल फैलाया है ।
मीडिया के जाल में फसा जो भी है
पत्रकारिता ने न्याय दिलवाया है।

मीडिया की भूमिका से बचा न कोई
सभी जगह में जाल फैला रहता है ।
पेपर , टी वी या सोसल मीडिया हो
इनसे ब्रेकिंग न्यूज मिलता रहता है ।

आरक्षण एस सी एस टी एक्ट 
यूजीसी कानून यूजीसी शुरू हुआ है।
तभी से सवर्णों  की नाराज़गी है
और आन्दोलन  भी शुरू हुआ है ।

सोशल मीडिया के पत्रकारों की 
पूरे देश में ही खबर चल रही है ।
दिल्ली के जंतर मंतर की खबरें 
फेसबुक वाट्सएप में चल रही हैं।

सरकार और सुप्रीम कोर्ट तक 
सोशल मीडिया की खबरें पहुंची है ।
थानों में जो एफ आई आर हो रही है
सोशल मीडिया से पुष्टि हो रही है ।

सारा सच न्यूज़ चैनलों पर रोक लगी है
आन्दोलन की खबर नहीं दिखाते ।
सरकार से सभी भयभीत हैं और 
सभी चुप्पी साधे ही रहते हैं। ।

आरक्षण एस सी एस टी एक्ट 
यूजीसी कानून नहीं हटता है ।
तो अगले चुनाव में जनता ही 
सारा सच सत्ता से इनको हटा देगी ।

   महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
        जबलपुर म प्र

खुश रहना सीखो - जय जिनेंद्र

खुश रहना सीखो - जय जिनेंद्र
विधा : कविता

तेरा मेरा जो साथ है। 
नई सुबह का इंतजार है। 
खुशियाँ भी अपरंपार है। 
इसलिए हमें तुमसे प्यार है।। 

चिंता से चिंतन का सफर है। 
इसलिए शरीर शिथिल है। 
देखकर सोचकर समझो। 
दुख में खुश रहना सीखो।। 

आज कल के चक्कर में। 
कल से प्रेम करते हो। 
अरे कल को छोड़ो। 
आज में जीना सीखो।। 

भरोसा नही है खुद पर। 
तो औरों का इंतजार क्यों। 
परिश्रम खुद करके देखो। 
फल की चिंता को छोड़ो ।। 

जीने की कला को सीखो। 
उदासी में खुशियाँ खोजो। 
सफलता मिलेगी तुम्हें निश्चित। 
पर पहले खुश रहना सीखो।। 

जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई

राखी - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

 राखी - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' 
असुरों का पलड़ा था भारी, जब हो रहा था देवासुर संग्राम। 
देवराज इंद्र ने देवगुरु
वृहस्पति से पूछा, कैसे होगी जीत अपनी, कैसे बनेगा अपना काम। 
इंद्र पत्नी इंद्राणी (शची) ने
रक्षा धागा, देवराज इंद्र की कलाई पर बांध दिया।
सावन पूर्णिमा का दिन था वह, जीत हुई इंद्र की, अपना सिंहासन उन्होंने वापस पा लिया।
विश्वास था, इसी धागे ने दिलाई जीत।
सावन पूर्णिमा के दिन, रक्षा बांधने की है रीत।
त्रेता युग में प्रभु ने, लिया वामन अवतार।
कश्यप जी-अदिति जी के पुत्र, पहुंचे बलि के द्वार।
तीन पग भूमि माँगी, दान स्वरूप।
सहर्ष तैयार हो गए बलि, नीति के अनुरूप।
एक पग में धरती मापी, दूसरे पग से अंबर।
तीसरा पग हेतु बलि निज सर झुका दिये, जोड़े दोनों कर।
खुश हुए प्रभु, दिया बलि को  पाताल लोक का राज्य।
बलि के कहने से,
प्रभु बन गए पाताल लोक के द्वारपाल। 
देवी लक्ष्मी जी,
बलि के पास आईं।
रक्षा बांधी बलि के हाथ, उपहार स्वरूप पति को वापस लाईं।
जब सुदर्शन चक्र से कान्हा की उंगली चोटिल हुई, अपना पल्लू फाड़ द्रौपदी ने कृष्ण की उंगली पर बांध दिया।
कृष्ण हुए भावुक, द्रौपदी को बहन माना, संकट में रक्षा करने का वचन दिया। 
भरी सभा में जब चीर हरण हुआ, द्रौपदी ने कृष्ण को पुकार लिया। 
कृष्ण ने चीर बढ़ाकर द्रौपदी की लाज बचाई, अपना वचन पूरा किया।
चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने, संकट में हुमायूं को राखी भेजी। 
मान रखा हुमायूं ने राखी की, कर्णावती की मदद को अपनी सेना भेजी।
कहते हैं सिकंदर की पत्नी रोक्साना ने पोरस को राखी भेजी, सिकंदर को नुकसान न पहुंचने का किया मनुहार।
पोरस ने राखी का मान रखा, नहीं किया सिकंदर पर वार।
भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक राखी का त्योहार, भारत में धूमधाम से मनाते  हैं।
भाई-बहन चाहे जितनी दूर रहें, राखी का त्यौहार  मिलकर ही मनाते हैं।
बहन रोली, अक्षत, दीपक, मिठाई से थाली सजाती, भाई को टीका करती।
भाई की आरती उतारती, भाई के हाथ राखी बांधती।
अपने हाथ से मिठाई खिला, भाई का मुंह मीठा करती।
भाई की लंबी आयु की प्रार्थना, बहन ईश्वर से करती।
भाई राखी बंधवाता, बहन को देता उपहार।
भाई बहन की रक्षा करने का संकल्प लेता, ईश्वर से प्रार्थना करता, बहन का सुखी रहे संसार।
ये त्यौहार ही हैं जो हमको जोड़े रहते हैं।
ये त्योहार ही हमारी संस्कृति को संभाल कर रखते हैं।
अपनों को करीब रखते, हमारे ये त्योहार।
अपने अगर संग है तो हर दिन है त्यौहार। 

डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' 
स्वरचित
West bangal 

Sunday, 20 September 2026

दूसरों के मन की बात को जानना सीखें - जौली अंकल

दूसरों के मन की बात को जानना सीखें - जौली अंकल

इंसान की ख़ामोशी और उसकी शारीरिक भाषा अक्सर शब्दों से कहीं अधिक सच बोलती है। अगर आप केवल व्यक्ति की बातों को सुनते हैं, तो आप आधी-अधूरी सच्चाई ही जान पाते हैं। बिना बोले बहुत कुछ समझना कोई जादू नहीं, बल्कि मानव व्यवहार (Human Behavior) और मनोविज्ञान का एक वैज्ञानिक पहलू है। जब हम किसी व्यक्ति के हाव-भाव, चेहरे के भाव और बैठने-उठने के तरीके पर ध्यान देना शुरू करते हैं, तो हमें उनकी सोच, नीयत और छिपी हुई भावनाओं का स्पष्ट आभास होने लगता है। इंसान क्या सोच रहा है, उसकी मनःस्थिति क्या है और वह आपसे कितना सच या झूठ बोल रहा है, इसे थोड़ा ध्यान और अभ्यास से समझना  बेहद आसान हो सकता है।

बॉडी लैंग्वेज और चेहरे के एक्सप्रेशन्स में किसी भी व्यक्ति की वास्तविक भावनाएं छिपी होती हैं। असली (Real) और नकली (Fake) मुस्कान को पहचानना बेहद सरल है, जब कोई दिल से मुस्कुराता है, तो उसकी आंखों के कोनों पर हल्की झुर्रियां (Crow's feet) बनती हैं और आंखें छोटी हो जाती हैं, जबकि केवल होठों को फैलाकर दी गई मुस्कान दिखावटी होती है। इसके अलावा, आंखों का संपर्क (Eye Contact) मन के द्वार खोलता है। लगातार और संतुलित आई कांटेक्ट आत्मविश्वास दर्शाता है, जबकि बात करते समय बार-बार आंखें चुराना, नजरें नीचे करना या पलकों को जरूरत से ज्यादा झपकाना घबराहट या कुछ छिपाने का संकेत होता है। व्यक्ति के पैर किस दिशा में हैं, यह भी उसकी रुचि को प्रकट करता है, यदि बातचीत के दौरान किसी के पैरों के पंजे आपकी तरफ हैं, तो वह आपकी बात में रुचि ले रहा है, और यदि पैर दरवाजे या बाहर की ओर मुड़े हैं, तो उसका मन वहां से जाने का है।

किसी व्यक्ति की मानसिकता और व्यक्तित्व को समझने में उसकी लिखावट (Handwriting) की सजावट, बनावट और दिखावट के पैटर्न भी बहुत बड़ी भूमिका निभाते है। हस्तलेखन और हस्ताक्षर वास्तव में मस्तिष्क के अवचेतन मन का दर्पण होते हैं। बड़े और स्पष्ट अक्षर लिखने वाले लोग आमतौर पर खुले विचारों वाले और सामाजिक होते हैं, जबकि छोटे और बारीक अक्षर लिखने वाले लोग गहरे विचारक, एकाग्र और थोड़े शर्मीले स्वभाव के हो सकते हैं। शब्दों के बीच की दूरी, लिखने का झुकाव (Tilt) और पेन का दबाव यह बताता है कि व्यक्ति का भावनात्मक संतुलन कैसा है। पर्सनालिटी टेस्ट और इन साइकोलॉजिकल ट्रिक्स की मदद से आप किसी के भी माइंड और सोच के पैटर्न को आसानी से डिकोड कर सकते हैं।

शांत रहने यानी साइलेंस (Silence) की पावर माइंड रीडिंग की सबसे बड़ी चाबी है। जब आप बातचीत के दौरान खुद चुप रहते हैं और केवल एक सजग श्रोता (Active Listener) बनते हैं, तो सामने वाला व्यक्ति सहज महसूस करता है और अपने मन के विचार खुद-ब-खुद प्रकट करने लगता है। ख़ामोशी आपको दूसरों के सूक्ष्म भावों, बॉडी लैंग्वेज और आवाज़ के उतार-चढ़ाव (Tone of Voice) को गहराई से समझाने का पूरा अवसर देती है। दूसरों के भावों और भावनाओं को पढ़ने की कला किसी पर हावी होने के लिए नहीं, बल्कि आपसी संबंधों में बेहतर तालमेल, सहानुभूति और विश्वास कायम करने के लिए अपनाई जाती है।

जौली अंकल बताते है कि दुनिया के महान विचारकों और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि महानता दूसरों पर हावी होने में नहीं, बल्कि उन्हें बिना शर्त समझने में है। जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान यही है कि आप शब्दों के पार जाकर इंसान के दिल और आत्मा की आवाज को सुनें। जब आप दूसरों के मन को सहानुभूति और निस्वार्थ प्रेम से पढ़ने की कोशिश करेंगे, तो आपके संबंध न केवल मजबूत होंगे बल्कि आपका अपना जीवन भी असीम शांति और सकारात्मकता से भर जाएगा। याद रखिए, एक सच्चा और संवेदनशील इंसान वही है जो दूसरों के बिना कहे उनके दर्द, खुशी और विचारों को महसूस कर सके। हमेशा मुस्कुराते रहिए, दिल से जुड़िए और दुनिया में खुशियां बांटते रहिए।
- जौली अंकल

Thursday, 17 September 2026

जीवन - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

जीवन - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' 

चौरासी लाख योनि में, मानव जीवन हमको मिला।
कभी अपने जीवन से हम खुश रहते, कभी होती हमें अपने जीवन से गिला।
जीवन की राह केवल फूलों से सजी नहीं होती, काँटें भी सामने आते हैं।
विवेकशील मनुष्य काँटों से बचते हुए, आगे बढ़ते जाते हैं।
जीवन एक अमूल्य यात्रा है, इस यात्रा को अच्छा या बुरा बनाना है हमारे हाथ।
सत्कर्म करने वालों के साथ, सदा रहतें प्रभु श्री नाथ।
जीवन में 
उतार- चढ़ाव आते रहते हैं, 
राहें समतल नहीं मिलतीं।
कभी छोटी-छोटी समस्याएँ आतीं, कभी स्थितियाँ विकट दिखतीं।
जन्म से लेकर मृत्यु तक हम अपनी, जिम्मेदारियां निभाने की कोशिश करते हैं।
जिम्मेदारियां निभाने की कोशिश में, कभी कष्ट सहते, कभी खुश रहते हैं।
चलते-चलते पांँव में छाले पड़े तो क्या हुआ, सोचो मंजिल 
अब पास ही है।
अपने से कम सुविधा वालों को देखो, लगेगा सबसे सुखी तो हम ही हैं।
कुंदन बनने के लिए, सोना को भी तपना पड़ता है।
कठिन परिस्थितियों में धैर्य जो रखता, जीवन में वही निरंतर आगे बढ़ता है।
"उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए,"  विवेकानंद जी के वचन। 
"जीवन साइकिल चलाने जैसा है। अपना संतुलन बनाए रखने के लिए आपको आगे बढ़ते रहना चाहिए" अल्बर्ट आइंस्टीन जी के कथन।
इरादा यदि नेक हो, 
कभी भी झुकना नहीं। 
दूसरों के जीवन को खुशियों से भरो, वही रास्ता चुनो जो हो सही।
औरों की बात सुनो ज्यादा, खुद बोलो कम।
परोपकार में अपना जीवन लगाओ, बाँटो सबके गम।
अपनी शिक्षा, अपनी प्रतिभा, इसे अपने जीवन की पूंजी  बनाओ।
सकारात्मक सोच रखो, वर्तमान को सुखमय बनाओ।
"अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति।
नेकु जो होती राम से, तो काहे भव - भीत?" पत्नी रत्नावली जी के इस वाक्य ने तुलसीदास जी का जीवन बदल दिया।
वृद्धावस्था, बीमारी, मृत्यु और संन्यासी का दृश्य,
राजकुमार सिद्धार्थ को भगवान बुद्ध बना दिया।
एक घटना ही काफी होता, जीवन बदलने के लिए। 
खुद के लिए जिए तो क्या जिए, अपना जीवन अर्पण कर दो औरों के हित के लिए। 
अपने अनुभव से सीखो, अपनी अच्छाइयों को पूंजी बनाओ।
निरंतर आगे बढ़ते रहो, अपने जीवन की बगिया महकाओ।

डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' 
स्वरचित
वैस्ट बंगाल